युथ डे स्पेशल: शादी का दबाव, तानों की गूँज, हर बैरियर को तोड़ती भारत की महिला खिलाड़ी

आज विश्व भर में अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जा रहा है।

युथ डे स्पेशल: शादी का दबाव, तानों की गूँज, हर बैरियर को तोड़ती भारत की महिला खिलाड़ी

आज विश्व भर में अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जा रहा है। लेकिन इस साल हमसब ने अपने देश के युवाओं को टोक्यों ओलम्पिक का हिस्सा बनते देखा अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल के मैदान में थोड़ी हार देखी तो थोड़ी जीत भी लेकिन उससे भी ज्यादा युवाओं का जोश देखा। अपनी सपनों की चादर बुनकर युवाओं ने अपना दमदार प्रदर्शन किया। लेकिन युथ में शामिल लड़कियों की बात की जाएँ तो महिला हॉकी टीम ने मेडल ना नहीं दिल जीत लिया लेकिन फिर भी उनके आंसू ना थमे क्यूंकि मन सवाल से भर चूका था उन लोगों के लिए जिन्होंने कभी उनके पिता से कहा था की ''लड़की निकर और टी-शर्ट में हॉकी खेलेगी, बाहर जाकर ये करेगी वो करेगी। 

यह शब्द रानी रामपाल के पिता से किसी ने कहे थे। 'अपनी बेटी को कहां बाहर भेजोगे, अगर ऊंच-नीच हो जाएगी तो क्या करोगे। बाहर अकेली है, पता नहीं क्या करती होगी?'' कुलदीप सिंह, कमलप्रीत के पिता। यह कुछ वाहियाद शब्द थे जो शायद उस हार के बाद कानों में गूँज रहे थे। लेकिन पीएम मोदी ने उनका हौसला हफ्जाई किया उन्हें भारत की शेरनियां कहा। फिर चाहे वो दलित समाज की वंदना कटारिया हो एक छोटे घर में रहने वाली मीरा भाई चानू हो लेकिन हमारी युवा शेरनियों ने दिखा दिया था जीवन में अभाव से कोई फर्क नहीं पड़ता अगर मैदान में उतरने का जज्बा हो। 

काबिलियत नहीं किस्मत देख रहे थे 

आँध्रप्रदेश में जन्मी कर्णम मल्लेश्वरी वेटलिफ़्टर और ओलोपिंक पदक विजेता ने अपने बीते समय के बारे में बताया एक घटना का ज़िक्र किया। उन्होंने बताया, ''मैं साल 1994 में इस्तांबुल में वर्ल्ड चैम्पियनशिप खेलने गई थी। उस दौरान सब सोच रहे थे की चीन गोल्ड लेकर जाएगा और सिल्वर और ब्रॉन्ज़ दूसरे लेकर जाएंगे। लेकिन इस चैम्पियनशिप में मुझे सिल्वर मिला फिर अचानक चीन की खिलाड़ी का डोपिंग मामला सामने आया और मुझे गोल्ड मिल गया तो मेरे साथी ही बोलने लगे कितनी किस्मत वाली है देखो। यानी वहां मेरी क़ाबिलियत को किस्मत को परखा जा रहा था 


1952 में भाग लिया पहली बार भाग 

पहली बार ओलंपिक में 1952 में भाग लिया था भारतीय महिलाओं ने भाग लिया था। खेल विश्लेषक नॉरिस प्रीतम मानते हैं कि 'खेल के मैदान में हम रानी और चानू जैसी खिलाड़ियों का जलवा देख रहे हैं लेकिन ना जाने इनसे ज़्यादा प्रतिभाशाली लड़कियां होंगी जिन्हे खेल के मैदान में अपनी प्रतिभा दिखने का मौका नहीं मिला रहा है। क्यूंकि इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हो सकते हैं। नॉरिस प्रीतम ने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया की एक बार एक महिला खिलाड़ी ने मुझसे यह पूछा की मेरी विरोधी खिलाड़ी की क्या खासियत है क्यूंकि उस समय टेक्नोलॉजी नहीं थी की लोग पहले वीडियो देखकर रणनीति बना ले।    


कब तक बने रहेगा फेम 

महिला अधिकारों के लिए कार्य करने वाली पीएन वसंती कहती है की ओलिंपिक मेडल लाना और भारत में चमकना एक आदर और सम्मान के काबिल है। भावी खिलाडियों को लोग और प्रोत्साहित करेंगे लेकिन मायने रखता है की लोगों के जेहन में कब तक रहेंगे खिलाड़ी। इनकी याद कब तक बने रहेगी इसका कहना मुश्किल है। क्यूंकि आज के समय में लोगों का रवैया जल्दी बदल जाता है लेकिन यह सच्चाई है। क्यूंकि हमारे समाज का आधा हिस्सा आज भी यही सोचता है की महिलाएं बैडरूम और रसोई में ज्यादा अच्छी लगती है। 

महिला खिलाड़ीयों पर था शादी का दबाव 

महिला पत्रकार हरप्रीत कौर ने महिला खिलाडियों से बात की उन्होंने बताया की अधिकांश महिला खिलाडियों पर शादी का दबाव था। यहाँ तक की रानी रामपाल के पिता ने बताया की लोग मुझे राय देते थे की रानी से हॉकी मत खिलवाओं मुझे उलटे सीधे ताने मरते थे लेकिन आज वहीं ताने देने वाले लोग अपने बच्चों का अड्मिशन हॉकी प्लेइंग में करा रहे है। खेल के मैदान में हर महिला खिलाड़ी की कहानी एक जैसी है क्यूंकि मर्दों को हम टोकने का सोच भी नहीं सकते है क्यूंकि हम एक रूढ़िवादी मानसिकता अभी शिकार है। लेकिन महिलाओं हर बरियर को तोड़ कर दिखा दिया की हम किसी से काम नहीं।