क्या है राज्य के चुनावी मिथक 

चुनाव की बात की जाये तो हर जगह के अपने अपने कुछ मिथक होते है।  मिथकों को तोड़ने के लिए सियासी दल और नेताओं के प्रयासो के बावजूद मिथक नहीं टूटते हैं  हालांकि राजनीति जानकारों की मानें तो यह एक संयोग है

क्या है राज्य के चुनावी मिथक 

2022 का विधानसभा चुनाव अब बहुत नजदीक है। उत्तराखंड की बात करें  तो 21 साल के अपने इतिहास में यहाँ के चुनाव बड़े रोचक रहे है।  राज्य गठन के बाद से प्रदेश में चार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। प्रदेश के चुनावी इतिहास में कोई भी दल लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल नहीं कर पाया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने बारी बारी सत्ता का सुख भोगा है। दोनों ही पार्टयों दो- दो बार चुनाव जीतकर सत्ता पर काबिज़ रही है पर  2007 और 2012 में भाजपा और  कांग्रेस दोनों को ही स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था और दोनों ने जोड़ तोड़ कर सरकार बनायीं थी।

चुनाव की बात की जाये तो हर जगह के अपने अपने कुछ मिथक होते है।  यहाँ भी है।  मिथकों को तोड़ने के लिए सियासी दल और नेताओं के प्रयासो के बावजूद मिथक नहीं टूटते हैं  हालांकि राजनीति जानकारों की मानें तो यह एक संयोग है। एनडी तिवारी के आलावा कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है। कुछ लोग इसके लिए मुख्यमंत्री आवास को दोष देते है।  धामी जी ने भी आवास जाने से पहले विदिवत पूजा करवाई थी पर यह कहना मुश्किल है की इस मिथक में कितनी सच्चाई है। वही किसी भी सत्ताधारी दल का सत्ता में वापसी न कर पाना भी एक मिथक ही माना जाता है जिसको तोड़ने की पुरज़ोर कोशिश इस बार भाजपा करती दिख रही है।

राज्य में एक और अनोखा मिथक यहाँ के शिक्षा मंत्री का रहा है। जो भी सरकार में शिक्षा मंत्री रहा है वह दोबारा चुनाव नहीं जीत पाया है। वर्ष 2000 में भाजपा सरकार में तीरथ सिंह रावत शिक्षा मंत्री बने थे। लेकिन 2002 के चुनाव में विधानसभा चुनाव हार गए थे। इसके बाद वर्ष 2002 में प्रदेश में एनडी तिवारी की सरकार बनी। तिवारी सरकार में नरेंद्र सिंह भंडारी शिक्षा मंत्री बने। वे 2007 में चुनाव हार गए थे।  2007 में भाजपा फिर सत्ता में आई। उस समय गोविंद सिंह बिष्ट और खजान दास शिक्षा मंत्री बने थे। लेकिन दोनों ही 2012 में विधानसभा चुनाव हार गए। वर्ष 2012 में कांग्रेस सत्ता में आई। देवप्रयाग विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने मंत्री प्रसाद नैथानी को शिक्षा मंत्री बनाया गया था। लेकिन वर्ष 2017 के चुनाव में चुनाव हार गए।  अब 2022 के चुनाव में वर्तमान सरकार में शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय इस मिथक को तोड़ पाएंगे या नहीं यह देखना होगा। 

एक और दिलचस्प चुनावी मिथक गंगोत्री सीट से जुड़ा हुआ है। उत्तरकाशी जिले के गंगोत्री विधानसभा सीट से जिस पार्टी का विधायक चुनाव जीतता है, उसी पार्टी की सरकार बनती है। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद 2002 में पहला विधानसभा चुनाव हुआ। गंगोत्री सीट से कांग्रेस प्रत्याशी विजयपाल सजवाण ने जीत हासिल की और सरकार कांग्रेस की बनी। 2007 में भाजपा प्रत्याशी गोपाल सिंह रावत ने चुनाव जीता और भाजपा सत्ता में आई। 2012 में फिर विजयपाल सजवाण ने कांग्रेस टिकट पर चुनाव जीता। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी। 2017 के चुनाव में भाजपा प्रत्याशी गोपाल सिंह रावत ने चुनाव जीता और भाजपा सत्ता में आई। वर्तमान विधायक गोपाल सिंह रावत का निधन हो गया है। इसी मिथक को सही मानते हुए आम आदमी पार्टी ने इस बार अपने मुख्यमंत्री उमीदवार कर्नल अजय कोठियाल के गंगोत्री से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है।

अब चुनावी मिथक कितने सही है यह तो वक़्त के साथ ही पता चल पायेगा पर जब तक यह टूट नहीं जाते तब तक तो मिथक ही कहलायेंगे ।