क्या है कांवड़ यात्रा और क्यों मनाते है इस यात्रा को

कांवड़ यात्रा की गूंज इस वक़्त जोरशोर के साथ चल रही है वही जहां यूपी में श्रद्धालु ख़ुशी ख़ुशी कांवड़ की तैयारी में लग चुके है वहीं उत्तराखंड के श्रद्धालुओं के लिए कांवड़ की तरफ से यह साल भी सुना निकला।

क्या है कांवड़ यात्रा और क्यों मनाते है इस यात्रा को

कांवड़ यात्रा की गूंज इस वक़्त जोरशोर के साथ चल रही है वही जहां यूपी में श्रद्धालु ख़ुशी ख़ुशी कांवड़ की तैयारी में लग चुके है वहीं उत्तराखंड के श्रद्धालुओं के लिए कांवड़ की तरफ से यह साल भी सुना निकला। कहते है जब मन में बसे हो शिव तो कांवड़ होने ना होने से क्या होता है। वैसे कांवड़ यात्रा का आयोजन हरसाल सावन माह में मनाते है इसकी शुरुआत श्रावण मास की शुरुआत से होती है और ये 13 दिनों तक यानि श्रावण की त्रयोदशी तक चलती है लेकिन शायद कुछ लोगों को कांवड़ का महत्त्व व कांवड़ यात्रा के बारे नहीं पता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार कहते है की कांवड़ यात्रा का प्रचलन लंकापति लंकेश्वर रावण ने किया था। रांवण भगवान शिव का परम भक्त था। वेद में कहा गया है की जब समुद्र मथन से विष निकला था तब सृष्टि को बचाने के लिए भोलेनाथ ने विष पी लिया था उन्होंने विष को अपने गले के बीचों बीच रखा था। लेकिन इस विष से भगवान शिव में नकारत्मक ऊर्जा होने लगी जिसे ठीक करने के लिए रावण ने कांवड़ यात्रा की उसने कई दिनों तक तप किया और गंगा जल लेकर भोलेनाथ का गंगाजल से अभिषेक किया। 

जिससे भोलेनाथ रावण की इस भक्ति से प्रशन्न हुए साथ ही नकारत्मक ऊर्जा का असर भी खत्म हो गया। 19वीं सदी की शुरुआत से भारत में कांवड़ यात्रा का जिक्र ब्रिटीशियन ने अपनी किताबों में किया है। वहीं 1960 में इस प्रथा को या इस प्रचलन को ज्यादा तामझाम के साथ नहीं मनाया जाता था लेकिन फिर धीरे धीरे कांवड़ को लेकर श्रद्धालुओं में आस्था बढ़ती चली गई और इसे बड़े आस्था और विश्वास के साथ मानाने लगे। इसके बाद 2010 से करोड़ों की तादात से श्रद्धालु हरिद्वार, राजस्थान, हरियाणा, झारखण्ड, मध्यप्रदेश, ओडिसा मुख्य स्थानों पर श्रद्धालु पहुंचने लगे।