उत्तराखंड: पहाड़ों पर बसी मां अनसूया निसंतानों की भरती है गोद जाने पूरी कथा

चमोली जिले में बसे माता अनसूया करती है भक्तों की मनकामना पूर्ण

उत्तराखंड: पहाड़ों पर बसी मां अनसूया निसंतानों की भरती है गोद जाने पूरी कथा

आस्था,भक्ति और ईश्वर शब्द जरूर विभिन्न है लेकिन भाव एक सामान है। कहते है जब जिंदगी में असफलता देखते देखते थक जाते है तब ईश्वर अपने द्वार खोलता है और इसी आस्था और विश्वास को लेकर हम पहुंच जाते है ईश्वर के दरबार में वहीं एक पौराणिक मान्यता है की उत्तराखंड के चमोली जिले के घने जंगलों के बीच माता अनसूया का छोटा सा एक भव्य मंदिर है। ऐसी मान्यता है की निसंतान दम्पंती इस मंदिर में संतान प्राप्ति की इच्छा लेकर आते है तो मां अनसूया उनकी मनोकामना जरूर पूरी करती है। कहते है मां अनसूया के मंदिर से कोई खाली हाथ नहीं जाता है। गांव के पुजारी प्रवीन सैमवाल के अनुसार माता ना सिर्फ निसंतान की कामना पूर्ण करती है बल्कि देवता भी माता अनसूया के आगे सर झुकाते है। पहाड़ों की वादियों के बीच बना मंदिर सबका मनमोह लेता है।  


त्रिदेवों ने ली थी माता अनसूया की परीक्षा 

बद्रीनाथ और केदारनाथ के बीच बसे इस मंदिर की कथा कुछ इस तरह से है। महर्षि अत्रि मुनि की पत्नी अनसूया की पति भक्ति तीनों लोक में फैली थी उनकी पति भक्ति की महिमा पुरे देवलोक विख्यात थी। उनकी इसी परीक्षा को लेकर माता लक्ष्मी,पार्वती और सरस्वती के अनुरोध पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश माता अनसूया की परीक्षा लेने पृथ्वीलोक पर जा पहुंचे। 

इसके  बाद त्रिदेवों ने साधु का भेष बना कर माता अनसूया की चौखट पर पहुंचे लेकिन उन्होंने वहां निर्वस्त्र होकर भोजन करने की शर्त रखी। इस दुविधा की घडी में जब माता अनसूया ने अपने पति का स्मरण किया तो सामने खड़े साधुओं के रूप में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश खड़े दिखाई दिए इसके बाद माता ने अपने कमंडल जल लेकर त्रिदेवों पर छिड़का जससे त्रिदेव छह महीने के शिशु  बन गए। वही शर्त के मुताबिक माता अनसूया ने बालक रुपी त्रिदेवों को ना सिर्फ भोजन कराया बल्कि स्तनपान भी करवाया। 

पति के वियोग में तीनों देवियां दुखी होने के बाद पृथ्वीलोक पहुंचीं और माता अनसूया से क्षमा याचना की। इसके बाद तीनों देवों ने भी अपनी गलती को स्वीकार कर माता की कोख से जन्म लेने का आग्रह किया। इसके बाद तीनों देवों ने माता को दो वरदान दिए। इससे उन्‍हें दत्‍तात्रेय, दुर्वासा ऋषि और चंद्रमा का जन्‍म हुआ, तो दूसरा वरदान माता को किसी भी युग में निसंतान दंपित की कोख भरने का दिया। यही नहीं, वजह है कि यहां जो कोई भी संतान की कामना के लिए आता है, वह खाली हाथ नहीं रहता। 

ऐसे पहुंच सकते हैं माता के मंदिर

अनसूया मंदिर जाने के लिए चमोली जिले की मंडल घाटी तक वाहन से आप पहुंच सकते हैं इसके बाद मंदिर तक जाने के लिए पैदल चलना होगा हालाकिं मंडल से माता के मंदिर तक पहुंचने के लिए पांच किलोमीटर तक लम्बी चढ़ाई करनी पड़ती है। इसके आलावा अगर बाहर के राज्य से आ रहे है तो ऋषिकेश तक ट्रैन से आ सकते है साथ ही श्रीनगर के रस्ते गोपेश्वर से होते हुए मंडल तक बीएस और टैक्सी से पहुंच सकते है। 


जानें माता की पूजा की विधि

निसंतान दंपति की कोख भरने के लिए माता के मंदिर की पहचान है। यहां संतान की चाह रखने वालों को शाम तक पहुंचना होता है। इसके बाद उन्‍हें पूजापाठ के बाद रात भर मंदिर में ही बैठाना होता है। इस दौरान अनसूया माता महिला को दर्शन देती हैं। इसके बाद महिला वहां से उठकर स्‍नान वगैराह करती है और फिर सूर्यादय के बाद एक बार फिर पुजारी पूजा करवाते हैं। इस दौरान जो पूजा सामान आप चढ़ाते हैं, उसमें से श्रीफल समेत कुछ चीजें आपको वापस मिलती हैं,जिन्‍हें आप अपने घर में मंदिर में जगह देते हैं. यही नहीं, जब आपकी मुराद पूरी हो जाती है, तो आप फिर से माता के दर्शन करने जा सकते हैं।