उत्तराखंड की रिद्धिमा ने उठाई जलवायु संकट के खिलाफ आवाज, 14 बच्चों यूएनओ में दायर की याचिका

जलचवायु संकट हमारे देश का गंभीर मुद्दा है लेकिन है बावजूद है इसे गंभीरता से लेने में हमारा देश थोड़ा पीछे है।

उत्तराखंड की रिद्धिमा ने उठाई जलवायु संकट के खिलाफ आवाज, 14 बच्चों यूएनओ में दायर की याचिका

जलचवायु संकट हमारे देश का गंभीर मुद्दा है लेकिन है बावजूद है इसे गंभीरता से लेने में हमारा देश थोड़ा पीछे है। वही एक बार फिर ग्रेटा थुनबेर्ग के तर्ज पर उत्तराखंड की बेटी ने जलवायु संकट को लेकर अपनी आवाज उठाई है। देवभूमि की बेटी रिद्धिमा पांडे बाल अधिकारों के लिए पांच देशों के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार समिति में आवाज उठाई है और रिद्धिमा की मांग है की अब दुनिया भर में जलवायु संकट पर आपातकाल घोषित करने की मांग की है।  

पांच देशों के खिलाफ एक याचिका

इसके लिए दुनिया भर से आए 14 बच्चों को लेकर संयुक्त राष्ट्र महासचिव के समक्ष याचिका दायर की गई है। बिगड़ते पर्यावरण संतुलन को देखते हुए रिद्धिमा ने संयुक्त राष्ट्र अधिकार बाल समिति में वर्ष 2019 में उन पांच देशों के खिलाफ एक याचिका भी दायर की है, जिसमें अत्यधिक पर्यावरणीय परिवर्तन के कारण बाल अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा था। 


14 देशों के बच्चों के साथ दायर की याचिका 

अब रिद्धिमा पांडे ने जलवायु परिवर्तन पर संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के समक्ष 10 नवंबर को 14 देशों के बच्चों के साथ एक याचिका दायर की है। याचिका में दुनिया भर के 14 बच्चों ने कहा है कि अवैध खनन, वनों की कटाई, प्रदूषण के कारण लगातार जलवायु परिवर्तन के कारण असंतुलन के कारण खतरा बढ़ रहा है. भारत में भी मनुष्य की सुविधा के लिए जंगलों को लगातार काटा जा रहा है। 


बचपन से है जागरूक 

साधुबेला कॉलोनी हरिपुर की रहने वाली रिद्धिमा पांडे बीएम डीएवी पब्लिक स्कूल में दसवीं की छात्रा हैं. रिद्धिमा बचपन से ही पर्यावरण के प्रति काफी जागरूक हैं। पर्यावरण को बचाने के लिए रिद्धिमा सिर्फ हरिद्वार और भारत को ही नहीं बल्कि कई देशों का भ्रमण भी कर रही हैं। 


आपातकाल घोषित करना चाहिए 

इन बच्चों का कहना है कि जिस तरह से सभी देशों ने कोविड-19 को आपातकाल घोषित किया है, उसी तरह जलवायु संकट पर आपातकाल घोषित कर जलवायु की रक्षा की जानी चाहिए। ताकि आने वाली पीढि़यों को भी देश और दुनिया में पर्यावरण के साथ-साथ अपना जीवन भी मिल सके और उन्हें उनका नैसर्गिक अधिकार भी मिल सके।