मुजफ्फरनगर गोली कांड बरसी: 27 साल बाद भी नहीं भूला गया वो दर्द, नहीं मिला सपनों का उत्तराखंड

रामपुर तिराहा मुजफ्फरनगर कांड के उस दर्द को आज पुरे 27 साल ही गए है. उत्तराखंड भले ही हर साल विकास की सीढियां चढ़ रहा है लेकिन अपने विकास में उत्तराखंड मुजफ्फरनगर कांड को भूल चूका है

मुजफ्फरनगर गोली कांड बरसी: 27  साल बाद भी नहीं भूला गया वो दर्द, नहीं मिला सपनों का उत्तराखंड

आज जहाँ देशभर में गाँधी जयंती मनाई जा रही है वही दूसरी तरफ रामपुर तिराहा मुजफ्फरनगर कांड के उस दर्द को आज पुरे 27 साल ही गए है. उत्तराखंड भले ही हर साल विकास की सीढियां चढ़ रहा है लेकिन अपने विकास में उत्तराखंड मुजफ्फरनगर कांड को भूल चूका है. उत्तराखंड शायद उस गोलीकांड की उस तमाम लोगों की चीखों की गूँज भूला बैठा है किस तरह से 27 साल पहले कितने शहीदों ने कुर्बानी दी थी.

 

निर्दोष पर गोली चलने वालों को भाजपा बड़े पद से नवाजती है

उत्तराखंड की सरकार इतनी मतलबी हो चुकी है की आंदोलनकारियों की आत्मा को चोट पहुचाते हुए शर्म भी महसूस नहीं करती है. क्योंकि ये जनता के हितों के लिए नहीं बल्कि अपना लालच भरा पेट लेकर सत्ता में उतरती है. याद है जिस डीएम ने मुज्जफरनगर में उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों को गोली मारने के आदेश दिए थे उसे आज केन्द्रीय रक्षामंत्री  राजनाथ सिंह ने अपना पीएस बना रखा है. दोहरी नीति रखने वाली भाजपा और कांग्रेस ने गोली चलानेवाले को सजा देने के बजाय बड़ी-बड़ी पद देकर उसे नवाजती रही है.

 

भाजपा करती है झूटी बातें

वैसे माना जाता है की देवभूमि उत्तराखंड पर बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस ही राज करती आ रही है. लेकिन राज्य आंदोलनकारियों का बर्बर दमन करने वाले प्रशासन के कर्मचारी और अधिकारियों को अभी तक सजा देने में किसी भी पार्टी को कोई दिलचस्पी ही नहीं है..क्योंकि ये दिखाबटी सरकारे सिर्फ अपना जेब भर निकल लेती है बल्कि राज्य की निकम्मी सरकार हर साल 2 अक्टूबर को आंदोलनकारियों का दमन करनेवाले गुनहगारों को सजा दिलाने की झूठी बातें करती है.

 

अंत में हुआ सपना साकार

इस गोलीकांड की बरसी पर इस दर्दनाक कहानी को एक बार फिर दोहराते है जब साल 1 अक्टूबर साल 1994 में लोग अपने अलग राज्य का सपना बुन रहे थे जो नारे लगा रहे थे कोदा – झंगोरा खाएंगे उत्तराखंड राज्य बनाएंगे. इस आन्दोलन में पुरुषों के साथ कई महिलाएं भी शामिल थी. आन्दोलनकारियों की बस तैयार थी और दिल्ली के जंतर-मंतर में पहुंच कर धरना प्रदार्शन करना था .लेकिन सरकार ने इस आदोलन को रोकना चाहा और रामपुर तिराहा मुजफ्फरनगर में अदोलान्कारियों की बस रोक ली गई. प्रशासन और आन्दोलनकारियों की इस भीड़ंत में पथराव और लाठीचार्ज शुरू हो गई. पुलिस ने लाठीचार्ज और फायरिंग के दौरान खेतों में भाग रही महिलाओं की अस्मत से भी खिलबाड़ किया था उस समय प्रशासन भूल गया था इसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल है ताबड़तोड़ फायरिंग से ना जाने कितनों की जान चली गई .सपना तो साकार हो गया लेकिन सरकार कुर्बानियों को भूल गई.

 

27 सालों दर -बदर घूम रही उत्तराखंडी

27 सालों से न्याय की तलाश में दर-बदर घूम रही उत्तराखंडी को ना तो न्याय मिला और ना ही शहीद हुए आंदोलनकारियों के सपनों का उत्तराखंड मिला. यह दृश्य कितना संवेदनहीन रहा होगा इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अगले दिन न सिर्फ अंतराष्ट्रीय स्तर पर घटना की निंदा हुई थी बल्कि घटना की सुनवाई के दौरान 1996 में इलाहबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रवि एस. धवन की खंडपीठ में जब यह सुनने को मिला की जो घाव लगे है वो प्रतिरोध की राजनीति की कीमत थी.

 

उनके दर्द को समझ सके अपना दर्द

अब सवाल उठता है कि क्या कभी इस नृशंस हत्याकांड के दोषियों को सजा मिलेगी.. नृशंस हत्याकांड के जो घाव आज भी उत्तराखण्डियों के सीने पर हैं क्या वह कभी भर पाएंगे.. सवाल तो यह भी है कि क्या ये वही उत्तराखण्ड है जिसके सपने राज्य आंदोलनकारियों ने देखें थे, जिसके लिए आंदोलनकारियों ने अपने सीने पर गोलियां खाई थी. शायद हम कह सकते हैं की इन दो भ्रष्टाचारी पार्टियों को छोड़ 2022 के चुनाव में उत्तराखंड तीसरी विकल्प को ढूंढ़ रही है जो उनके दर्द को अपना दर्द समझ सके.