जानिए कैसे हुई पावन "कावड़ यात्रा" की शुरुआत , क्या है नियम और कितने है प्रकार

भोलेनाथ के पावन महीने सावन की शुरुआत होते ही पूरे देश में कांवड़ियों की भीड़ उमड़ पड़ती है, हर साल शिव के भक्त बड़े ही उत्साह के साथ इस यात्रा को मनाते है ।

जानिए कैसे हुई पावन "कावड़ यात्रा" की शुरुआत , क्या है नियम और कितने है प्रकार
भगवान भोलेनाथ के पावन महीने सावन की शुरुआत होते ही पूरे देश में कांवड़ियों की भीड़ उमड़ पड़ती है, हर साल शिव के भक्त बड़े ही उत्साह के साथ इस वार्षिक उत्सव को मनाते हैं जिसके बाद पवित्र गंगाजल को ले जाकर शिव के भक्त अपने गृह नगरों में भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं मगर अभी भी ऐसे बहुत से लोग होंगे जो यह नहीं जानते कि कावड़ यात्रा की शुरुआत कैसे हुई, इसके नियम क्या है, अथवा यह कितने प्रकार की होती है।

कहा जाता है कि कावड़ यात्रा का इतिहास बहुत ही प्राचीन है हिंदू शास्त्रों की मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव के महान भक्त भगवान परशुराम ने पहली बार इस कावड़ यात्रा को सावन माह के दौरान किया था उसी वक्त से कावड़ यात्रा संतो द्वारा की जा रही है मगर 1960 में यह प्रकाश में आई इस यात्रा में पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं।

पावन कावड़ यात्रा को लेकर एक और मान्यता है इस यात्रा की शुरुआत त्रेता युग में श्रवण कुमार द्वारा की गई थी श्रवण कुमार के माता पिता की इच्छा थी कि वह चारों धाम के दर्शन करना चाहते हैं जिसके बाद श्रवण कुमार ने कावड़ बनाकर उसमें अपने माता पिता को बिठाकर उन्हें चार धाम के दर्शन कराए थे और उत्तराखंड के हरिद्वार में गंगा स्नान करवाया था।

आपको बता दें कि कोविड महामारी के 2 साल बाद कावड़ यात्रा की शुरुआत हुई है इस बार कावड़ यात्रा 14 जुलाई 2022 को शुरू हुई है और यह शिवरात्रि के दिन तक जारी रहेगी।


क्या है कावड़ यात्रा का महत्व

कावड़ यात्रा एक पवित्र और बेहद ही कठिन यात्रा है इस यात्रा में पूरे भारत में शिव भक्त विशेष रूप से उत्तर भारत में विभिन्न पवित्र स्थानों से गंगाजल लाने के लिए इस यात्रा को पूर्ण करते हैं वह पवित्र गंगा में डुबकी भी लगाते हैं और कावड़ को अपने कंधों पर ले जाते हैं।

कावड़ बास से बना एक छोटा सा खंबा होता है इसके विपरीत छोर पर घड़े बंधे होते हैं भक्त उन्हीं घड़ो को गंगाजल से भरते हैं और फिर नंगे पांव पैदल चल कर  अपनी कावड़ यात्रा को पूरा करते हैं।

 
कावड़ यात्रा के होते हैं चार प्रकार


कावड़ यात्रा का इतिहास बहुत ही पुराना है इस यात्रा के कई नियम होते हैं जिसके तहत इसे चार भागों में बांटा गया है-

1- सामान्य कावड़ यात्रा

इस कावड़ यात्रा में शिव भक्त जो उम्र दराज हो या पहली बार इस यात्रा को कर रहे हैं वह विश्राम करते करते और पंडाल में रुक कर इस यात्रा को पूरा कर सकते हैं।


2- खड़ी कावड़ यात्रा 
यह यात्रा बेहद ही कठिन होती है इस दौरान शिव भक्तों को लगातार चलना होता है यदि वह किसी कारणवश रुकते हैं तो उनका सहयोगी साथी अपने कंधे पर कावड़ को रखकर हिलाता रहता है जिससे यह प्रतीत होता है की कावड़ यात्रा जारी है।


3- दांडी कावड़ यात्रा
दांडी कावड़ यात्रा बेहद ही कठिन और सबसे लंबी कावड़ यात्रा है क्योंकि इस यात्रा में शिव भक्त शिवलिंग तक दंड देते हुए जाते हैं इस यात्रा को पूरा करने में 30 दिनों तक का समय लग जाता है।


4- डाक कावड़ यात्रा
डाक कावड़ यात्रा मैं ऐसा इंतजाम किया जाता है जिससे जलाअभिषेक की प्रक्रिया निरंतर जारी रहती है यानी कि इस यात्रा में शिव भक्त शिवलिंग के पास पहुंचने के अलावा कहीं नहीं रुकते हैं यहां तक कि डाक कावड़ियों के लिए रास्ते साफ कर दिए जाते हैं।


क्या है कावड़ यात्रा के नियम

कावड़ यात्रा के नियम बहुत ही कठिन होते हैं इस यात्रा के दौरान शिव भक्तों को मांस मदिरा तथा किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन से दूर रहना होता है इस यात्रा के दौरान आपका कावड़ को जमीन पर भी नहीं रख सकते बिना नहाए आपका वर्ड को हाथ भी नहीं लगा सकते और ना ही सर पर रख सकते है, साथ ही आप कावड़ को किसी वृक्ष के नीचे भी नहीं रख सकते हैं।