अटल जी की पुण्यतिथि पर जानिए “कैसे अटल बिहारी वाजपेयी बने राजनीति के भीष्म पितामाह”

साल 1924 गवालियर की धरती पर एक ऐसे गुदड़ी लाल का जन्म  हुआ जिसने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से भारत का नाम पूरे विश्व में रोशन कर दिया

अटल जी की पुण्यतिथि पर जानिए “कैसे अटल बिहारी वाजपेयी बने राजनीति के भीष्म पितामाह”
साल 1924 गवालियर की धरती पर एक ऐसे गुदड़ी लाल का जन्म  हुआ जिसने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से भारत का नाम पूरे विश्व में रोशन कर दिया हम बात कर रहे है अटल बिहारी वाजपेयी जी की अटल जी  की उदारता को समझने की कोशीश करना चाहते है तो आप केवल एक वाक्य से समझ सकते है वो वाक्य है "जय जवान,जय किसान,और जय विज्ञान".16 अगस्त 2018 को अटल जी ने हम सभी का साथ छोड़ दिया आज अटल जी की पुण्यतिथि है आइये उनकी पुण्यतिथ  पर उनसे जुडी कुछ ऐसी बाते आपसे साझा करते है जो शायद आपने भी नहीं सुनी होगी.


अटल जी राजनेता थे ये सभी जानते है मगर क्या आपको पता है की राजनीति में आने से पहले अटल जी एक पत्रकार थे शरुआती दिनों में अटल जी और लाल कृष्णा आडवानी दोनों ही साथ पत्रकारिता किया करते थे की अचानक फिर कुछ ऐसा हुआ जिसके बाद अटल जी को राजनीति में आना ही पड़ा दरअसल बतौर पत्रकार अटल जी अपना काम बखूबी कर रहे थे. 1953 की बात है, भारतीय जनसंघ के नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर को विशेष दर्जा देने के खिलाफ थे.  जम्मू-कश्मीर में लागू परमिट सिस्टम का विरोध करने के लिए डॉ. मुखर्जी श्रीनगर चले गए. परमिट सिस्टम के मुताबिक किसी भी भारतीय को जम्मू-कश्मीर राज्य में बसने की इजाजत नहीं थी. यही नहीं, दूसरे राज्य के किसी भी व्यक्ति को जम्मू-कश्मीर में जाने के लिए अपने साथ एक पहचान पत्र लेकर जाना अनिवार्य था. डॉ. मुखर्जी इसका विरोध कर रहे थे. वे परमिट सिस्टम को तोड़कर श्रीनगर पहुंच गए थे.


इस घटना को एक पत्रकार के रूप में कवर करने के लिए वाजपेयी भी उनके साथ गए. वाजपेयी इंटरव्यू में बताते हैं, 'पत्रकार के रूप में मैं उनके साथ था.  वे गिरफ्तार कर लिए गए. लेकिन हम लोग वापस आ गए. डॉ. मुखर्जी ने मुझसे कहा कि वाजपेयी जाओ और दुनिया को बता दो कि मैं कश्मीर में आ गया हूं, बिना किसी परमिट के” इस घटना के कुछ दिनों बाद ही नजरबंदी में रहने वाले डॉ. मुखर्जी की बीमारी की वजह से मौत हो गई. इस घटना से वाजपेयी काफी आहत हुए. उन्हे लगा की डॉ. मुखर्जी के काम को आगे बढ़ाना चाहिए इसके बाद वाजपेयी राजनीति में आ गए. वह साल 1957 में वह पहली बार सांसद बनकर लोकसभा पहुंचे. 



वाजपेयी को उनकी वाकपटुता और करिश्माई व्यक्तित्व के लिए जाना जाता है।लोग उनकी सरलता को इस कदर पसंद करते थे की एक बार प्रधानमंत्री नेहरु ने भी कहा था की एक रोज अट‌ल बिहारी वाजपेयी देश के प्रिय नेता और प्रधानमंत्री ज़रूर बनेंगे अटल जी पहले ऐसे पहले भारतीय प्रधानमंत्री भी थे, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण देने का फैसला किया।


अटल जी को खाने पीने और कविताओ  का बहुत शौक था अटली जी को शाकाहारी की जगह मांसाहारी खाना बहुत पसंद था। मांसाहारी व्यंजन में उन्हें झींगा मछली सबसे ज्यादा पसंद थी। अटल जी अक्सर प्रॉन की डिश खाते थे। वह अपने विचारों को कई बार कविताओं के माध्यम से ही सामने रखते थे। उनका कहना है कि कविता उनके लिए जंग में हार नहीं, बल्कि जीत की घोषणा की तरह है।


भारत वर्ष में शायद ही कोई ऐसा होगा, जो अटल जी के भाषण का दिवाना न हो। उनकी सभा में दूर-दूर से लोग शिरकत करते थे। उन्हें सुनने के लिए मीलों पैदल चलकर लोग सभास्थल तक पहुंचते थे। लेकिन, शायद यह आपको पता नहीं होगा कि भाषण देने से पहले अटल जी किस चीज का सेवन करते थे। दरअसल, कोई सभा करने से पहले अटल जी मिश्री और काली मिर्च का सेवन जरूर करते थे। इतना ही नहीं उन्हें मथुरा की मिश्री बेहद पसंद थी। इसलिए, उनके लिए हमेशा मथुरा से मिश्री मंगाई जाती थी।


ऐसे ही हजारो किस्से अटल जी के बारे में है जिन्हे जानने के बाद आपको एहसास होगा की अटल जी की छवि जैसा न कोई है न कोई होगा.