हिन्दुस्तान में मिलता है "जापानी समोसा" जो बनावट और स्वाद में है अनोखा

राजधानी दिल्ली में मशहूर है जापानी समोसा लेकिन आम समोसे से बिल्कुल अलग है जापानी समोसा

हिन्दुस्तान में मिलता है "जापानी समोसा" जो बनावट और स्वाद में है अनोखा

हिन्दुस्तान में समोसे की बात की जाए तो समोसा जितना आम है उतना ही ख़ास है। ज्यादातर हमसब समोसे का एक ही प्रतिरूप जानते है त्रिकोण अकार आलू का स्टफ और अपनी किसी पसंदीदा हरी या लाल चटनी के साथ खाना। लेकिन हिन्दुस्तान में एक ऐसी भी जगह है जहां जापानी समोसा मिलता है। इस जापानी समोसा का स्वाद इतना अलग और सवादिष्ट है की इसे खाने के लिए लाइन लगी होती है। अब ये पढ़ कर लग रहा होगा की जापानी समोसा कैसे हो सकता है चलिए ज्यादा सस्पेंस न रख कर आपको जापानी समोसे बनने की कहानी और उसके इतिहास से रूबरू करा देते है। 

जापानी समोसे की कहानी राजधानी दिल्ली के मशहूर चांदनी चौक से जुड़ी है। अब खाने से पहले यहां तक पहुंचना तो पड़ेगा ही तो चलिए बता देते है की दिल्ली के लाल किला के सामने जो सड़क चांदनी चौक की तरफ जाती है बस वहां पहुंच कर कुछ दूर आगे चलकर दाईं ओर मोती सिनेमा से पहले पुरानी लाजपत राय मार्केट की ओर भी मुड़ती है। इसी मार्केट में मनोहर ढाबा है। हालाकिं मनोहर ढाबा के मालिक को भी नहीं पता की इस समोसे का नाम जापानी का समोसा क्यों पड़ा है। 

मनोहर ढाबा में केवल जापानी समोसा ही नहीं चोला भटूरा,भरवां तंदूरी पराठा, मसालेदार मटर पनीर, दाल मक्खनी, रायता और तंदूरी रोटी भी मिलती है लेकिन इस ढाबे को ख़ास बनता है यहां का जापानी समोसा। हालाकिं रूप तौर पर बिल्कुल उन समोसे सा नहीं जैसा की आमतौर में हमसब खाते है। बता दे की इस समोसे में साठ लेयर होती है। वहीं इसमें स्पेशल मसाला और आलू मटर के साथ इसे स्टफ किया जाता है  घीया का अचार व हरी मिर्च के साथ परोसा जाता है। वहीं इस जापानी समोसे की कीमत महज बीस रुपये है चालीस रुपये में आपको दो समोसे मिलेंगे। सुबह के चार बजे से जापानी समोसा बनना शुरू हो जाता है और सुबह के आठ बजे से रात के नौ बजे तक मनोहर ढाबा खुला होता है। 

इस ढाबे के संचालक उमेश का कहना है की आजदी के बाद वर्ष 1949 में मनोहर व उनके भाई गुरुबचन ने मनोहर ढाबा को चलाना शुरू किया था उसके बाद गुरुबचन के बेटे उमेश और उमेश के बेटे ऋषभ व जतिन साथ मिलकर ढाबा चलाते है। उन्होंने बताया की देश विभाजन से पहले उनकी दूकान लाहौर स्थित निस्बत रोड के दयाल सिंह कॉलेज के पास उनकी जापानी समोसे की दुकान थी। वहीं बटवारें के बाद उमेश परिवार सहित दिल्ली आ गए। वहीं उमेश ने जब कई बार बड़े बूढ़ों से जापानी समोसे के नाम पड़ने का कारण जानना चाहा तो उनको बदले में एक ही जवाब मिला "यार तो तू जापानी समोसा बेच, नाम के चक्कर में ना पड़।