श्रद्धलुओं के सामानों की सुरक्षा करते है यहां लंगूर, बंदरों के उत्पाद से बचाते है लंगूर

प्राचीन दक्षिणकाली मंदिर में लंगूर करते है श्रद्धलुओं की सुरक्षा

श्रद्धलुओं के सामानों की सुरक्षा करते है यहां लंगूर, बंदरों के उत्पाद से बचाते है लंगूर

 
अक्सर हमसब ने बंदरों को उत्पाद मचाते हुए देखा है कभी घर की छत पर भी बन्दर और लंगूर आ जाएं तो हमेसा हमसब का नुकसान करके जाते है। बंदरों और लंगूरों से एक ऐसा अजीबों गरीब किस्सा सुनने को मिला है जिसे सुनकर आपसब चौंक जाएंगे। दरअसल हरिदूवार के प्राचीन दक्षिणकाली मंदिर का है जहां बन्दर और लंगूरों का झुंड रहता है लेकिन यह लंगूर उत्पाद मचाने के बजाय श्रद्धलुओं के सामानों की सुरक्षा करते है। 


इंसानों वाले नाम 

यहां रहने वाले लंगूर इतने समझदार है उनकी समझदारी का सबूत देखकर श्रद्धालु खुद हक्के बक्के रह जाते है। इन लंगूरों का मुखियां है बंटी जो नाम पुकारते ही दौड़ा हुआ चला आता है। जिस वक़्त लंगूर किसी भी सामान की पहरेदारी करते है उस वक़्त उनके पास कोई फटक भी नहीं सकता है। वैसे भी आमतौर पर देखा गया है की जहां लंगूर होते है वहां बन्दर नहीं होते। सावन की बदरिया में मंदिर के बाहर लंगूर आनदंमय होकर भोजन का लुफ्त उठा रहे है। 

बन्दर करते है नुकसान तो लंगूर सिखाते है सबक 

वहीं उस रस्ते से गुजरने वालों श्रद्धलुओं को अगर बन्दर परेशान करते है या उनका सामान छीनकर भागते है या उन्हें दांत भी लगा देते है तो लंगूर उन बंदरों को छोड़ते नहीं है उनका पीछा करके उन्हें दूर तक भगा कर आते है। उस मंदिर के पुजारियों ने बताया लंगूर आज से नहीं काफी समय से है और श्रद्धलुओं के प्रति उनका वफादार स्वभाव बहुत पुराना है। उन्होंने कभी भी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। श्रद्धालुं मंदिर से जाते जाते उन्हें कुछ न कुछ खिलाते हुए जाते है। 

एक आवाज पर सोनू बबलू दौड़े आते है 

इस बारे में फूलवती बताती है की वह पिछले एक दशक से लंगूरों को खाना खिला रही है। वहीं लंगूरों के बारे में उन्होंने बताया की वह उन्हें तीन टाइम खाना खिलाती है। उन्होंने लंगूरों का नाम रखा है सोनू, बबलू,मोनू आदि यह कम से कम 35 लंगूरों का झुंड है। वही आसपास ठेला लगाने वालों से लंगूर घुले मिले है उनके सामान को कभी नुकसान नहीं पहुंचाते है। श्रद्धालु उन्हें केले या बिस्किट खिलाते है। जो ठेले वाले अपना ठेला छोड़ कर जाते है लंगूर उनकी देखरेख करते है। 


अधिकतर मंदिरों और आश्रम के आसपास उत्पाती बंदर दिख जाते हैं। प्राचीन श्री दक्षिणकाली मंदिर जंगल से सटा है। मंदिर क्षेत्र में बंदरों के आतंक से श्रद्धालुओं को लंगूर बचाते हैं। मंदिर के आसपास 35 लंगूरों का झुंड है। बीते कई सालों से लंगूर मंदिर के आसपास ही रहते हैं। श्रद्धालु उनको केले और दूसरे फलों के अलावा बिस्कुट व चने खिलाते हैं। मंदिर के आसपास कई दुकानें और फलों के ठेले लगते हैं। लंगूर ठेलों की पहरेदारी तक करते हैं। अगर उनकी गैर मौजदूगी में बन्दर आते है तो लंगूर का झुंड उन्हें सबक सिखाते है।