डॉक्टर दिवस पर कुछ ख़ास साथियों को खोने के बाद भी नहीं टूटी हिम्मत

जो अपने जीवन की चिंता छोड़ कर हमारे जीवन को बचाते है, जो बिना थके बिना रुके सेवा कार्य में लग जाते है,वो इस धरती पर ईश्वर का दूसरा रूप है जो डॉक्टर्स कहलाते है,

डॉक्टर दिवस पर कुछ ख़ास साथियों को खोने के बाद भी नहीं टूटी हिम्मत

जो अपने जीवन की चिंता छोड़ कर हमारे जीवन को बचाते है, जो बिना थके बिना रुके सेवा कार्य में लग जाते है,वो इस धरती पर ईश्वर का दूसरा रूप है जो डॉक्टर्स कहलाते है,। डॉक्टर हमारे लिए जीवन मे क्या महत्त्व रखते है इसका अर्थ और इसका महत्त्व हमे कोरोना के इस युद्ध में देखने को मिल गया। करोड़ों की जान बचाते बचाते कितने डॉक्टर इस युद्ध में कुर्बान हो गए। अपने परिवारों की चिंता छोड़ देश के परिवारों की जान बचाने में दिन रात जुटे रहे। हालाकिं संघर्ष अभी भी जारी है अभी भी डॉक्टर्स अपने कार्य और जीवन दान देने के लिए सतर्क है। हालाकिं कोरोना हमारे लिए किसी युद्ध से कम नहीं था इस योद्धा के रक्षक हमारे डॉक्टर ने इस युद्ध में तमाम अपने साथियों को खोया लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी बल्कि सेवाभाव से लगे रहे। आइए जानते है इस संघर्ष की कहानी डॉक्टर की जुबानी 


डॉ. पवन दत्ता रेजीडेंट डॉक्टर, सफदरजंग, नई दिल्ली 

डॉ. पवन दत्ता ने बताया की उस संकट की घड़ी के बारे में सोचकर मुझे आज भी नींद नहीं आती हर तरफ बुरा हाल था मुझे 48-48 घंटों से अपनी लगातार ड्यूटी देते रहता था। इस विपदा में मुझे बहुत बुरा महसूस हुआ की हम कई मरीजों की जान नहीं बचा पाएं। कभी कभी मुझे लगता था की परिवार को मौत की खबर देने की जिम्मेदारी मेरी थी। मुझे आज भी उन दो मरीजों के चेहरे याद हैं जिनमें एक उम्र 35 और दूसरे की 37 साल थी। मैंने खुशी-खुशी उनके परिवार को बताया कि मरीज को अगले दिन डिस्चार्ज कर देंगे , अब वह ठीक हैं, लेकिन उसके दो घंटे बाद अचानक मरीज की तबीयत बिगड़ने लगी और दोनों की मौत हो गई। इसके बाद मेरी हिम्मत टूट गई। समझ नहीं आ रहा था कि उन लोगों को फिर से फोन करके कैसे यह खबर? खैर, मेरी आंखों में आंसू थे और आवाज भी दबी थी। मैंने परिवार को बताया और उन्होंने उस स्थिति को समझा भी। 


डॉक्टर अमित वर्मा मैक्स हॉस्पिटल, देहरादून 

कोरोना से जुड़े अनुभव के बारे में डॉ अमित वर्मा ने बताया की यह विश्व की बेहद बुरी और दर्दनाक स्तिथि थी। इस कोरोना काल में ना सिर्फ आमजन ने अपने परिवारों को खोया है बल्कि डॉक्टर्स ने अपने कई टीम मेम्बर को खोया है जो अपने प्रोफेशन में बहुत ही अच्छे डॉक्टर साबित हुए लेकिन आज उन्होंने मरीजों की जान की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है। लेकिन मुझे पता है इतिहास में हमारे कुर्बान हुए डॉक्टर्स को जरूर याद किया जाएगा। बहुत सारे मरीजों की जान बचा कर ख़ुशी और संतोष मिलता था जब वो डिस्चार्ज होते थे हमारे चेहरे पर भी मुस्कान होती थी की चालों इस जंग का छोटा सा हिस्सा हम जीत गए।


डॉ विनोद सीनियर रेजिडेंट, एम्स, ऋषिकेश

पहली लहर के दौरान क्वारंटीन केंद्र खोला गया था। जो दूसरी लहर आते-आते बंद भी हो गया। कोरोना का पहाड़ी क्षेत्रों में कम असर नहीं था। जब एम्स भर गया, तो उस केंद्र को शुरू करने के लिए पूछा गया कि वहां कौन-कौन जाएगा। 3 दिन तक जब कोई सामने नहीं आया, तो मैं अपने दोस्त डॉक्टर राहुल, स्मिता, अजयपाल और डॉक्टर रवि राज के साथ वहां पहुंचा। वहां बहुत गंदगी और अव्यवस्था थी। खुद जगह साफ की। एम्स की मदद से बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराएं 150 बिस्तर वाला केंद्र अभी भी चल रहा है। ऑक्सीजन कंसंट्रेटर भी खुद लाए।