बड़ी खबर: चुनावी मज़बूरी में देवस्थानम बोर्ड हुआ भंग

महीनों चल आ रही देवस्थानम बोर्ड मंगलवार आज भांग कर दिया गया है। चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड दो साल पहले त्रिवेंद्र सरकार के दौरान अस्तित्व में आया था

बड़ी खबर: चुनावी मज़बूरी में देवस्थानम बोर्ड हुआ भंग

महीनों चल आ रही देवस्थानम बोर्ड मंगलवार आज भंग कर दिया गया है। चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड दो साल पहले त्रिवेंद्र सरकार के दौरान अस्तित्व में आया था। वही इसे लेकर हक़ हक्कूधारियों और तीर्थपुरोहितों में काफी विरोध चल रहा था लगभग एक साल तीर्थपुरोहित अपनी जिद्द पर अड़े हुए थे। साथ ही कृषि कानून वापस होते ही संकेत मिल गए थे की अब कहीं ना कहीं उत्तराखंड में चल रहे देवस्थानम बोर्ड से भी राहत मिल जाएगी। तीर्थयात्रियों, अधिकार धारकों के विरोध और कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बोर्ड को मुद्दा बनाने के कारण सरकार पर दबाव था।


श्राइन बोर्ड की तर्ज बन रहा था देवस्थानम बोर्ड 

अंतिम दिन समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी। मुख्यमंत्री ने समिति की रिपोर्ट का अध्ययन करने के लिए बंदोबस्ती मंत्री सतपाल महाराज की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कैबिनेट उपसमिति का गठन किया। समिति के अन्य सदस्यों में कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल और स्वामी यतीश्वरानंद शामिल थे। उपसमिति को दो दिनों के भीतर अपनी सिफारिशों के साथ परीक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था। पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने वर्ष 2019 में श्राइन बोर्ड की तर्ज पर चारधाम देवस्थानम बोर्ड बनाने का फैसला किया। तीर्थयात्रियों के विरोध के बावजूद सरकार ने सदन से एक विधेयक पारित कर अधिनियम बनाया। तीर्थयात्री और चारधाम के अधिकार धारक आंदोलन पर उतर आए, लेकिन त्रिवेंद्र सरकार अपने फैसले पर अड़ी रही।


कहीं यह चुनावी मज़बूरी तो नहीं 

जैसा की पुरोहितों को भरोसा दिलाया था की 30 नवंबर तक देवस्थानम बोर्ड वापस लिया जा सकता है। वही बीते सोमवार उच्च समिति की अध्ययन की बैठक के दौरान पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने प्रमुख बिंदुओं पर गहन चर्चा की थी साथ इसके बाद शाम को कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने उपसमिति की जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी दी थी। वही अब इसे चुनावी मज़बूरी भी कह सकते है क्यूंकि गढ़वाल क्षेत्र की 17 विधानसभा सीटों पर चार धाम के पुजारियों की अच्छी खासी आबादी है। सूत्रों ने दावा किया कि सत्तारूढ़ भाजपा गढ़वाल सीटों पर मतदाताओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं खोना चाहेगी और इसलिए, अधिनियम को निरस्त करने के प्रस्ताव को राज्य कैबिनेट की बैठक में मंजूरी मिल सकती है।